मंगलवार, 16 नवंबर 2021

स्वतन्त्रता-1


विषय - स्वतन्त्रता
दिनांक - 17 अगस्त 2021
रचनाकार  - श्री रामावतार चंद्राकर
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चीर तमय के गहन हिय को,
 दिव्य दिवाकर चमका है ।
कुंठित मन की अभिलाषाएं,
 हो स्वतंत्र अब दमका है ।
कितनों घर का दीप बुझे ,
तब ये उजियारा आया है ।
खोकर देश की वीर विभूतियाँ ,
 स्वतन्त्रता को पाया है ।।

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सभ्य पुरातन आर्यावर्त की ,
गौरव को जिसने मलिन किया ।
वैभवशाली विरासत को भी ,
कुटिल दृष्टि से गमगीन किया ।
तोड़ बेड़ियां  अब सोने की ,
चिड़िया ने पंख फुलाया है ।
खोकर देश की वीर विभूतियाँ ,
 स्वतन्त्रता को पाया है ।।

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मूक रही जो स्वप्न सुनहरे ,
पथ भी लथपथ रक्तभरा था ।
जैसे तूफानों में कोई धर ,
शांत रूप में ओज भरा था ।
अवरुद्ध हो गयी वाणी में ,
अब शारद ने वास बनाया है ।
खोकर देश की वीर विभूतियाँ ,
 स्वतन्त्रता को पाया है ।।

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सिसक रही थी मानवता जो ,
आज वो देखो आनन्दमय है ।
ब्रज,बंशिवट और यमुना तट ,
झूम रही संतुष्ट हृदय है  ।
बैठ कदम्ब पर फिर केशव ने,
मुरली की तान सुनाया है ।
खोकर देश की वीर विभूतियाँ ,
 स्वतन्त्रता को पाया है ।।

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बोस,भगत,आजाद ने हमको ,
पेश किया सुन्दर नजराना ।
स्वयं हो गए अमर और हमको,
सौप दिया अनमोल खजाना।
श्रृंग हिमालय पर दम्भ मय,
सपनों का तिरंगा लहराया है।
खोकर देश की वीर विभूतियाँ,
 स्वतन्त्रता को पाया है ।।

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महक उठी अब गुलशन फिर से,
अलीगन ने  फिर ली अंगड़ाई।
आसमान पर देवताओं ने भी,
हर्षित होकर  दुंदुभि बजाई ।
गन्धर्वों ने मंगलगान किया अरु,
अरुनप्रिया ने सुमन बरसाया है।
खोकर देश की वीर विभूतियाँ,
 स्वतन्त्रता को पाया है ।।

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आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई
जय हिंद

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