मंगलवार, 16 नवंबर 2021

स्वतंत्रता -3

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स्वतन्त्रता अच्छी नही ,होती जो संस्कार हीन।
कभी कभी बेगैरत भी कर जाती घर को मलिन।।
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घर मे बच्चों को सदा ,आजादी न प्रदान करे।
दण्ड समय पर दीजिये,गलती जो नादान करे।।
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हो स्वतन्त्र जब फंस जाए, लरिका जो कुसंगत में।
मुश्किल होगा फिर उसको,सही रंगन में रंगत में ।।
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सूर्पनखा जो हो स्वच्छंद, पंचवटी में नही जाती ।
खर -दूषन भी बच जाता,शायद लंका भी रही जाती ।।
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मर्यादा से सदा  सुशोभित ,घर का उपवन रहता है ।
सभ्य समाज की रचना करता,बनकर सुमन महकता है।।
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स्वतंत्रता संगीत भी है ,जो लय बन्धन से सज्जित है।
वरना घोर चीत्कार ये,  करता समाज को लज्जित है।।
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संयम धरकर जब नदियां ,बहती है कल-कल करती ।
जीवों को जीवन देती ,कृषको की समस्या हल करती।।
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पवन,आग,भी संयम से,काम अपना जब करता है।
सांसे बनकर जीता है , दीपक बनकर जलता है ।।
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स्वतंत्रता मर्यादित हो जब, प्राण जगे मानवता में ।
जनमानस  में प्रेम जगे, पड़े दरार विषमता में।।
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