मंगलदीप जलावत आवत l
तिमिरांगण के समरभूमि,
निज शौर्य प्रभा बिखरावत आवत l
हेतु बने नव आस दिखावत,
धवल ध्वजा फहरावत आवत l
भरी भरी थाल ले द्वार पे सखिया,
बन्दनवार सजावत आवत l
हो प्रसन्न ऋतुराज बहुविधि ,
त्रिविध बयार बहावत आवत l
कण्ठ पे मिश्री घोल कोयलिया,
मंगल शबद सुनावत आवत l
उपवन की शोभा को बढ़ावत,
नवकलियाँ दल खिल खिल जावत l
