रविवार, 23 अगस्त 2026

ऐ दोस्त ...



===============================

थाम लेती है किनारे अपनी बाहों में ,
रूठकर आती हुई  लहरों के वेग को ।
समा लेती है अपने अंदर समंदर जैसे ,
दौड़कर आती सरिताओं के आवेग को।
फिसलता हुआ पगडंडियों पर चल रहा था मैं,
तेरी दोस्ती ने उस पर चलना सीखा दिया ।
मुझे जीना सीखा दिया मुझे मरना सीखा दिया ,
मुझे चलना ,सम्भलना मुझे निभना सीखा दिया ।

ऐ दोस्त तेरे साथ बिताया गया वो हर लम्हा ,
मेरे मूर्छित मन के लिए मानो संजीवनी था ।
मेरे बंजर दुखमय रूपी हिरन जहाँ रहकर,
सुख पाए तुम्ह ऐसा हरितमय अवनि था।
मैं डूब रहा था जीवन की  दर्दभरी तलैया में,
तुने हाथ पकड़कर मुझको तरना सीखा दिया।
मुझे जीना सीखा दिया , मुझे मरना सीखा दिया ,
मुझे चलना ,सम्भलना मुझे निभना सीखा गया ।

जीवन के दिये हुए घावों पर हमने मिलकर ,
अपने आंसुओ के मरहम को खूब लगाया ।
सांझा किया हर दर्द हर दिन शाम को बैठकर ,
अपने गमो को एक दूसरे के बांहो में छुपाया।
उलझ  गया था मैं अधूरी  मंजिले राह पर,
कुछ दूर साथ चलकर तूने उबरना सीखा दिया ।
मुझे जीना सीखा दिया मुझे मरना सीखा दिया ,
मुझे चलना ,सम्भलना मुझे निभना सीखा दिया ।

शाम होते ही बैठकर उस तालाब के किनारे ,
मैं हर रोज तेरे आने की राह तकता रहता हूं।
इस आस में की तेरे साथ मैं अपनी आज की,
जिंदगी बया करूँगा ये खुद से कहता रहता हूं।
मेरी बोझिल सी थकी शाम को सानिंध्यता ने तेरे ,
दृढ़ होके  विपत्तियों  को सहना सीखा   दिया ।
मुझे जीना सीखा दिया  मुझे मरना सिखा दिया ,
मुझे चलना ,सम्भलना मुझे निभना सीखा दिया ।

अस्ताचल में जाता हुआ सूरज को देखकर ,
मेरा मन रूपी पंकज जब जब हुआ उदास ।
हो प्यास से मै व्याकुल जब भी यूँ बैठा थककर,
प्याली लिए हुए जल की तुझे पाया मैं अपने पास ।
सहकर के मुश्किलो को हो सब्र करके जीना ,
कठिनाइयों से लड़कर निखरना सीखा दिया ।
मुझे जीना सीखा दिया मुझे मरना सीखा दिया,
मुझे चलना ,सम्भलना मुझे निभना सीखा दिया ।

जीवन के इस नाव को जब जब  भी मैंने,
रिश्तों की समंदर की गहराइयों में उतारा ।
लहरों के थपेड़ों से मार खा कर के मैंने ,
फंसकर के भंवरजाल में तब तुझको पुकारा।
बनकर के मांझी तुमने मझधार में उतरकर,
अपनो के आंधियो बीच ठहरना सीखा दिया ।
मुझे जीना सीखा गया, मुझे मरना सिखा गया ,
मुझे चलना ,सम्भलना मुझे निभना सीखा गया ।




पाखण्डता

=========================
है सिलसिला ये कैसा,  राह- ए- मजार में ,
खबर नही किसी को,  पर चल रहे हैं सब।
मन मे लिए उमंगे न , जाने किस बात की,
पाने को सुख कौन सा , मचल रहे हैं सब ।

=========================

फैला के वो अशांति,  पाने चले हैं शांति ,
जो कर रहे हैं क्रांति , घर मे समाज मे ।
खुद को कहे वेदांती , फैलाये वही भ्रांति,
दुनिया है जिसको जानती,  गृहकलह काज में।

============================

मन मे है कलुषताई , तनिक भी न मनुषाई,
हैवानियत है छाई , नजरो में जिसके देखो ।
है बन के वही साई ,  मानवता को ठगे भाई,
जग में है भ्रम फैलाई ,जरा खोल आंखे लेखों।

=============================

अधरों में प्रीति छाई , कपट हृदय में समाई,
पावक है वो लगाई ,  मदमस्त शांती वन में।
फिर भी न चैन आई , पीछे छुरी हैं चलाई,
कालनेमि बन के छाई,  प्रेम भक्ति के आंगन में।

=============================

पाखण्डता की है हद , नही कोई भी है सरहद,
वो अपने बढ़ाने कद ,  गुमराह सबको करते ।
है कौन सी वो मकसद , पाने को जिसकी है जद,
पीकर के कपट का मद , है सबको छला करते ।

==============================

हृदय में नही प्रीति , वह कौन सी है नीति,
करके वो राजनीति,  अपनो को उसने बांटा।
फिर चल गई वो रीति , नित बन रहे हैं भीति,
है सबकि आपबीती ,  है बो गए वो कांटा ।

=============================

खुद को जरा सम्हालो ,  नई ज्ञान दीप जला लो,
इंसानियत को तुम बचा लो, इन क्रूर दानवो से ।
नई रीति तुम बना लो ,  प्रेम भूषण अब सजा लो,
मनभेद को अब टालो ,  मानव का मानवों से।

==============================
अवतार हो तुम्ह राम का ,  है समय ये संग्राम का,
है मर्यादाएं नाम का ,  कर सायक अब सम्हालो।
है शोर त्राहिमाम का,   इन अधम दुष्टो के धाम का,
संधानो सर अंजाम का,  तरकश को अब सजा लो ।
===============================
रचना =    कुर्मि रामावतार चन्द्राकर



ख्वाहिशें


::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

होती है बेहिसाब ख्वाहिशें ,
सुखद स्वप्न से भरी हुई ।
भौतिक सुख की चकाचौंध में ,
दुल्हन सी सँवरि हुई।

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

प्रेमपयोधि में वो कभी ,
मगन हो के डूबकर खो जाता ।
कभी अपने भीतर के मधुबन,
के मीठे फल तोड़ के खाता

:::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

सुंदर ख़्वाब के आसमान में,
उड़ता रहता बहुत सुख पाता।
तारो की नगरी में भी वह ।
अपना एक आशियाँ बसाता ।

:::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

कभी फकीरो की बस्ती में,
खुद को पाकर मस्त हो जाता ।
वैभव की नगरी में वह कभी,
बन  सम्राट है हुकुम सुनाता ।

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

बेफिक्री से निर्भय होकर ,
जीवन मग पर कदम बढ़ाता।
मन की जितनी भी इच्छायें ,
पूरन कर  प्रसन्न हो जाता ।

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

लेकिन सभी पूरे नही होते ,
बहुत अधूरे रह जाते है ।
जीवन की फिर हरित ख्वाहिशे,
मुरझाकर करके सुख जाते हैं ।

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

देखे गए वह सुखद स्वप्न सब,
आंखों से ओझल हो जाते ।
जीवन की शाश्वत सत्य हमारे,
सभी कल्पना को  झुठलाते ।

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::
उतर आता तब हो उदास मन,
खुली आँखों के पृष्टभूमि पर।
व्यथित हो के घायल पंक्षी सा ,
अम्बर से गिर जाता भूमि पर ।

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

बहुत दौड़ाया घोड़े को मै ,
किन्तु रेस में जीत न पाया ।
स्वार्थहीन जीवन के कुछ पल,
का ही सुख मेरे हाथ मे आया ।

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

कौन भला हुआ इस जग में ,
पूरनकाम हो जिसकी ख्वाहिशे।
कितनो यतन करो पर सबकी ,
 पूरी होती है चंद  ख्वाहिशे ।

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::
















वेदना

जिरह दिल की कोई समझे नही ,हम जी रहे कैसे।
कहे तो हाल ए मन किससे कहे ,हम जी रहे कैसे।।

टूटा तिलिस्म सपनों का, जीया भी अब जाता नही।
कोई  पूछे तो बतलाये  ,विरह विष पी रहे कैसे।।

बरषों तराशा जिस पत्थर को, मूर्त रूप में लाने को,
छूट गया कर से अब हिम्मत, सूरत बनी रहे कैसे।।

सन्नाटा चहुँ ओर है पसरा ,बैरन सी अब हवा लगे,
बताओ इस तिमिरांगन मे, दुल्हन सजी रहे कैसे।

वेदनाओं से भरा दिल, जश्न अब भाता नही है,
पीड़ा अम्बर गठरी लाद के, जाने जी रहे कैसे।।

काश कहीं उसके संग मैं भी, बनकर पंछी उड़ जाता,
जीवन की उन्मुक्त सफर में ,बिन उनके ही रहे कैसे ।।


एक हाथ से जीवन का ये, बोझ उठाया नही जाता,
डगमगाती  पैरो के नीचे , अब ये महि रहे कैसे।।

मिलइ न जगत सहोदर भ्राता, सत्य वचन है रामचंद्र का,
वेदना की बेड़ी में बंधकर, हम  जाने जी रहे कैसे।








बारी सबकी आएगी

रचनाकार  -  कुर्मी रामावतार चन्द्राकर
====================

होना मत हैरान सखे ,
जो बांटा है मिल जाएं तो,
खाएं थे जिस पेड़ से आम ,
वो पत्थर गर बरसाए तो।
गुजरी हुई वो समय की कतरन,
अवसि लौट के आएगी,
देर सही ; पर धीरे धीरे ,
 बारी सबकी आएगी ।।

======================

देख खाक होती झोपड़ियां,
नयनों में सुख छाया  था ,
बुझती हुई चिंगारी को क्या,
तुमने नही भड़काया था,
चिंगारी है वही; एक दिन,
 दिशा भूल कर जाएगी,
देर सही ; पर धीरे धीरे ,
 बारी सबकी आएगी ।।

======================

गेंहू की बाली मरोड़कर,
दोनों हाथों से मसला था,
पंकज की कोमल पंखुड़ियां,
पैरों पर रख कुचला था,
जब कालचक्र चाबुक लेकर,
कृत कर्मों को दौड़ायेगी,
देर सही ; पर धीरे धीरे ,
 बारी सबकी आएगी ।।

======================

फलती हुई प्रेम विटप जड़ पर ,
तुमने जब मट्ठा डाला था,
जब तुमने उसे ही मार दिया,
जो तुम पर मरने वाला था।
उन सम्बन्धों का करुण हृदय,
ये चीख चीख चिल्लाएगी,
देर सही ; पर धीरे धीरे ,
 बारी सबकी आएगी ।

=====================

तेरे लिए जब धर्म थे पतले,
और रुपिया खासा मोटा था,
स्वारथ की रस्सी से तुमने,
अपनो का ही गला घोंटा था।
जो रुप है तेरा छुपा हुआ ,
वह रूप समय दिखलाएगी,
देर सही ; पर धीरे धीरे ,
 बारी सबकी आएगी ।।

======================

सूरज से उजियारा लेकर ,
दुनियां को तिमिर परोसा है,
वरदान मिला जिस धड़कन से,
उसको भी तुमने कोसा है।
किरणों के कण को तरसेगा,
बन कालनिशा जब छाएगी,
देर सही ; पर धीरे धीरे ,
 बारी सबकी आएगी ।।

======================

जब प्यास से व्याकुल चिड़ियों को,
जल पीने से ललकारा था,
जब लौट गया तेरे चौखट से,
कोई दीन समय का मारा था।
अब वही समय तेरा पीछा कर ,
 कर्मों का हिसाब लगाएगी l 
देर सही ; पर धीरे धीरे ,
 बारी सबकी आएगी ।।

======================

अवतार सार यही गीता का ,
जो किया है वही भरेगा भी,
नही करम जाल से छूटेगा,
है नियम यही प्रकृति का भी।
जीवन पृष्ठों पर जो हैं लिखा ,
इतिहास वही दोहराएगी,
देर सही ; पर धीरे धीरे ,
 बारी सबकी आएगी ।।

======================
जारी है ........





आहट

-----------------------------------------------------------

आकर फिर से देहली मेरे , हृदयांगन को कुसुमित कर जा ।
अतिआतप से व्याकुलता को, हे! बसन्त अब सुरभित कर जा ।।
-----------------------------------------------------------
मन को झंकृत करती थी जो, सरगम जाने कहाँ गई ।
हिय तटनी की नवीन तरंगो ,में आकर नवजीवन भर जा।।
------------------------------------------------------------------
जिसके कदमताल सुनने को, चौखट में सौ दिये जलाये।
शिशिर निशा की शशि किरण इस, तप्तभूमि में जरा बिखर जा ।।
------------------------------------------------------------------
महुआ के उस बाग में मैंने, बरसों महफ़िल को है सजाया।
कोयल कूजित अब तो कर दो, ऐ! पायल अब छमछम कर जा ।।
------------------------------------------------------------------
हिमगिरि के जिस श्रृंग में बैठा, शिशिर ऋतु में अटल तपस्वी ।
निज आगमन ध्वनि से हिय में, मित्रकिरण नवचेतन भर जा ।।
------------------------------------------------------------------
यहाँ वहाँ घन कबसे बरषे , कोई प्रतीक्षारत है तुम्हारा ।
चातक के प्यासी आँगन में, स्वाति के ऐ! मेघ बरष जा ।।
------------------------------------------------------------------
तुलसी चन्दन दधि दुर्बा अरु, दीपक लेकर द्वार खड़ा है।
कर्ण है आतुर शब्दध्वनि को, हे! आगन्तुक जरा दरश जा ।। 
------------------------------------------------------------------
हिय उद्द्धि के मंथन से जो ,दिव्य सुधा प्रागट्य हुआ है ।
निज कर से ऐ नई किरण अब, जनमानस में ओजस भर जा ।।
------------------------------------------------------------------

अलीगन ने है जश्न सजाया, शायद रति ने दस्तक दी है ।
नवकलियों का स्वागत करने ,सोमसुधारस प्याला भर जा ।।
------------------------------------------------------------------
तम मग के इस गहन कानन में, विस्मृत मन को कोई पुकारे ।
जीवन के कर्कश तारो को, सप्तस्वरों से लयबद्ध कर जा ।।
------------------------------------------------------------------
मुंडेर पे काग की कर्कश ध्वनि भी ,कानो को प्रिय आज क्यो लागे ?
अपनी आने का प्रमाण दे, ऐ कंगन अब खनखन कर जा ।।

------------------------------------------------------------------

नई आस

                 नई आस               

कल्पना साकार होता दिख रहा है,
आसमाँ फिर साफ होता दिख रहा है।।
छाई थी कुछ काल से जो कालिमा,
आज फिर से धुंध छटता दिख रहा है ।
कल्पना साकार....

खारमय आँगन में बिखरी थी लताएँ,
कह रही थी अपनी अंतश की व्यथाएँ।
आती जाती दल मधुप की सरसराहट,
कुछ नवीन सन्देश देता दिख रहा है ।
कल्पना साकार....

धूल धूसरित पंछियो का चहचहाना,
सुप्त तुफाओं का फिर से फैल जाना।
तोड़कर दुश्मन के शस्त्रों को गरजकर,
बादलों का बरष जाना दिख रहा है ।
कल्पना साकार....

निकरों के व्यवहार का आघात सहते,
संत बन हर कृतघ्नता का घात सहते।
गिरा बेबस कण्ठ कुण्ठित थे जो कब से,
आज फिर से मुखर होता दिख रहा है ।
कल्पना साकार....

नई किरण से सज रही है शहर फिर से,
ले रही अंगड़ाइयाँ दोपहर फिर से ।
बज रही शहनाइयां और ढोल,ताशे,
आह्लादित देवतागण दिख रहा है ।
 कल्पना साकार....

✒️✒️✒️- रामावतार चंद्राकर 





ऐ दोस्त ...

=============================== थाम लेती है किनारे अपनी बाहों में , रूठकर आती हुई  लहरों के वेग को । समा लेती है अपने अंदर समंदर जैसे , दौड़क...