गुरुवार, 16 दिसंबर 2021

वेदना

जिरह दिल की कोई समझे नही ,हम जी रहे कैसे।
कहे तो हाल ए मन किससे कहे ,हम जी रहे कैसे।।

टूटा तिलिस्म सपनों का, जीया भी अब जाता नही।
कोई  पूछे तो बतलाये  ,विरह विष पी रहे कैसे।।

बरषों तराशा जिस पत्थर को, मूर्त रूप में लाने को,
छूट गया कर से अब हिम्मत, सूरत बनी रहे कैसे।।

सन्नाटा चहुँ ओर है पसरा ,बैरन सी अब हवा लगे,
बताओ इस तिमिरांगन मे, दुल्हन सजी रहे कैसे।

वेदनाओं से भरा दिल, जश्न अब भाता नही है,
पीड़ा अम्बर गठरी लाद के, जाने जी रहे कैसे।।

काश कहीं उसके संग मैं भी, बनकर पंछी उड़ जाता,
जीवन की उन्मुक्त सफर में ,बिन उनके ही रहे कैसे ।।


एक हाथ से जीवन का ये, बोझ उठाया नही जाता,
डगमगाती  पैरो के नीचे , अब ये महि रहे कैसे।।

मिलइ न जगत सहोदर भ्राता, सत्य वचन है रामचंद्र का,
वेदना की बेड़ी में बंधकर, हम ही जाने जी रहे कैसे।








कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

नई आस

                 नई आस                कल्पना साकार होता दिख रहा है, आसमाँ फिर साफ होता दिख रहा है।। छाई थी कुछ काल से जो कालिमा, आज फिर से ध...