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होती है बेहिसाब ख्वाहिशें ,
सुखद स्वप्न से भरी हुई ।
भौतिक सुख की चकाचौंध में ,
दुल्हन सी सँवरि हुई।
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प्रेमपयोधि में वो कभी ,
मगन हो के डूबकर खो जाता ।
कभी अपने भीतर के मधुबन,
के मीठे फल तोड़ के खाता
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सुंदर ख़्वाब के आसमान में,
उड़ता रहता बहुत सुख पाता।
तारो की नगरी में भी वह ।
अपना एक आशियाँ बसाता ।
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कभी फकीरो की बस्ती में,
खुद को पाकर मस्त हो जाता ।
वैभव की नगरी में वह कभी,
बन सम्राट है हुकुम सुनाता ।
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बेफिक्री से निर्भय होकर ,
जीवन मग पर कदम बढ़ाता।
मन की जितनी भी इच्छायें ,
पूरन कर प्रसन्न हो जाता ।
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लेकिन सभी पूरे नही होते ,
बहुत अधूरे रह जाते है ।
जीवन की फिर हरित ख्वाहिशे,
मुरझाकर करके सुख जाते हैं ।
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देखे गए वह सुखद स्वप्न सब,
आंखों से ओझल हो जाते ।
जीवन की शाश्वत सत्य हमारे,
सभी कल्पना को झुठलाते ।
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उतर आता तब हो उदास मन,
खुली आँखों के पृष्टभूमि पर।
व्यथित हो के घायल पंक्षी सा ,
अम्बर से गिर जाता भूमि पर ।
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बहुत दौड़ाया घोड़े को मै ,
किन्तु रेस में जीत न पाया ।
स्वार्थहीन जीवन के कुछ पल,
का ही सुख मेरे हाथ मे आया ।
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कौन भला हुआ इस जग में ,
पूरनकाम हो जिसकी ख्वाहिशे।
कितनो यतन करो पर सबकी ,
पूरी होती है चंद ख्वाहिशे ।
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