आश्चर्य कैसा
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नही अवतार जीवन का ,
समझ में भेद है आता ।
कभी दौर ए मोहब्बत में ,
कहीं रंजिश है रह जाता ।
बताकर के कभी ख़ंजर ,
हृदय को भेद जाए तो ।
नही हैरत जमाने में ,
कहीं कुछ भी हो जाये तो ।।
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समय की चक्रवातों ने ,
बुना ये जाल कैसा है ।
चमन के तलबगारों पर ,
लगा बन्दिश ये कैसा है ।
नव यौवन सुमन से भी ,
नही खुशबू जो आये तो ।
नही हैरत जमाने में ,
कहीं कुछ भी हो जाये तो ।।
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तेरे , आंगन मे आने से ,
नही सुख स्वर्ग से कम था ।
तेरे किंचित उदासी से ,
चार आंखे नीर से नम था ।
बड़ा होकर वही सन्तान ,
अगर आंखे दिखाये तो ।
नही हैरत जमाने में ,
कहीं कुछ भी हो जाये तो ।।
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उठाकर गर्त से जिसको ,
सितारा हमने बना दिया ।
कहीं पर घाव देखा तो ,
दवा उनको लगा दिया ।
किये उपकार के बदले ,
दगा अगर मिल जाय तो ।
नही हैरत जमाने में ,
कहीं कुछ भी हो जाये तो ।।
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उत्सव में हम आजादी के ,
सजाये ख्वाब थे कितने ।
शिक्षाविद बने पढ़लिख ,
है बालक आज के जितने ।
कड़कती धूप में बचपन ,
जो श्रमबिन्दु बहाये तो ।
नही हैरत जमाने में ,
कहीं कुछ भी हो जाये तो ।
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नदी की तेज धारा को ,
सहज ही चीर डाला है ।
धरा के गर्भ में जाकर ,
रत्नों को भी निकाला है ।
वहीं पौरुष अगर मजबूरी ,
के "कर" हार जाए तो ।
नही हैरत जमाने में ,
कहीं कुछ भी हो जाये तो ।।
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वारी मथे घृत होइ जो ,
तो विस्मय नही करना ।
कहीं आम, इमली पर उगे ,
तो विस्मय नही करना ।
इन संविधान के पन्नों पर ,
अगर कब्जा हो जाय तो ।
नही हैरत जमाने में ,
कहीं कुछ भी हो जाये तो ।।
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जियो तुम्ह जिंदगानी में ,
हँसीपल को सँजोकर के ।
कभी आती नही दर पर ,
खुशी ,गम ये बताकर के ।
मीठी प्रेम गोरस पर,
खटाई गर पड़ जाए तो ।
नही हैरत जमाने में ,
कहीं कुछ भी हो जाये तो ।।
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रामावतार चन्द्राकर

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