देखु नयनभर होकर पुलकित , कब आओगे मेरे राम।।
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अंतर्मन मेरा महक उठा बस,
अनुभव को पाकर के तुम्हारा।
स्मृति में आते ही झुक जाए,
चरणों मे ये शीश हमारा ।
हर पल तुझको ही मैं गाऊ,
रैन दिवस नित आठो याम।
देखु नयनभर होकर पुलकित ,
कब आओगे मेरे राम ।
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कितना प्यारा आकर्षक छबि,
अपनी ओर है मुझे बुलाते ।
मानव मात्र के हृदय पटल पर ,
अपनी दिव्य छटा बिखराते।
इस अनूप छवि को निहारकर ,
व्याकुल मन पाए विश्राम ।
देखु नयनभर होकर पुलकित ,
कब आओगे मेरे राम ।
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प्यासे मन को तृप्ति मिले जहाँ,
दिव्य सुधारस केवल तुम्ह हो ।
आच्छादित जिसकी खुशबू से ,
इस तन वन का चन्दन तुम्ह हो ।
जिसके चरित विटप के निचे ,
बैठ सदा ही मिले आराम ।
देखु नयनभर होकर पुलकित ,
कब आओगे मेरे राम ।
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परमारथ के मारग पर चल
मानव मानव है बन सकते ,
होकर ही अभिमान शून्य हम,
यश के भागी हम बन सकते ।
मानवता के सम्बन्धों को ,
करते तुम्हि परिभाषित राम।
देखु नयनभर होकर पुलकित ,
कब आओगे मेरे राम ।
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अछूत नही कोई जाति धर्म से ,
किसने है ये भरम फैलाया ।
निज स्वारथ के सिंहासन पर ,
बैठ के राम को दोष लगाया ।
केवट से मिलकर तुम्ह आओ ,
तब कहना है दोषी राम ।
देखु नयनभर होकर पुलकित ,
कब आओगे मेरे राम ।
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अवध भूमि की पावनता अरु,
सरयू की अति शुचि जलधारा।
श्रृंगवेरपुर गंगा का तट
चित्रकूट दण्डकवन सारा ।
तेरी दिव्य सुरति कर जाती ,
ये सारे अति पावन धाम ।
देखु नयनभर होकर पुलकित ,
कब आओगे मेरे राम ।
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रिश्तों की जिस मर्यादा को,
तुमने था सुदृढ बनाया ।
वचनबद्धता क्षमा करुणा को ,
मानवता का रीढ़ बनाया ।
टूट रही अब सब मर्यादाएं।
ना जाने कब मिले विराम।
देखु नयनभर होकर पुलकित ,
कब आओगे मेरे राम ।
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समय
वृक्ष
अहंकार
चलता ही जाऊंगा
अधिकार

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