बुधवार, 18 नवंबर 2020

शेर -ए-जिंदगी -:{जीवन का दर्द}



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दिल के हकीम दिल के दर्द को बढ़ा गया,
राह ए वफ़ा में झूठी अदाएं  गढ़ा गया ,
कहकर मुझे हमदर्द छलावा किया मुझसे,
फिर अपनी दगाओ के भेंट वो चढ़ा गया ।

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चलता रहा मैं यूं ही मुझे कुछ न था खबर,
शतरंज की मोहरों के जैसे मैं था बेखबर ,
न जाने वो क्या नुश्खे खुदगर्ज कर गया ,
अनजान था मैं धीरे धीरे कर गया असर ।

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दुनियां के उजालो ने मुझे खूब रुलाया,
तन्हाई के आंचल में मैंने खुद को छुपाया ,
निकला वो कातिल ए नकाब में मेरे अपने,
जिस खून के रिश्तों को मैंने खूब निभाया ।

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वो छोड़ गया मुझको था मैं जिसके सहारे,
मैं बैठकर के रोया बहुत दरिया किनारे ,
क्या खूब लिखा है  मेरे रब ने नसीब में ,
उजड़ी पड़ी है कब से जिंदगी की बहारें ।

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जब जिसने मुझे जब भी बुलाया चला गया ,
हर रोज मैं अपनो के ही हाथों छला गया
सब अपनी अहमता में इस कदर डूबा  रहा ,
रोना तो बहुत आया  पर हँसता चला गया ।

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जलाया जिस दिप को प्रकाश के लिए ,
बांधा था मैंने नेह को विश्वास  के लिए ,
वो बुझ गया वो टूट गया राह ए बीच मे ,
वक्त जो सँजोया था जिस आस के लिए ।

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नेकी के पत्थरों को मैं तराशता रहा ,
खुश होता रहा जब उसे निहारता रहा ,
मैं चलता रहा हाथ पूण्य के लिये मशाल,
फिर भी न मिला जिसको मैं तलाशता रहा ।

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बचपन के दौर को मैं जब भी याद करता हूं
आंखों में ले के अश्रुजल आहे मैं भरता हूं ,
वो माँ का आँचल वो हमसाया बाप का ,
ईश्वर से पुनः पाने को फरियाद करता हूं।

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 रचना -रामावतार चंद्राकर 






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