शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

मिल जाएगा

मिल जाएगा 
::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

विस्मृत मन में ख्वाब सुनहरे ,
यूं ही उलझ उलझ जाए रे,
टूटी हुई सी तारे मन की,
 फिर से राग सुना जाए रे।
तिल तिल मरती हुई सांसो में,
 जीवन फिर से भर जाएगा,
नेक नियत से मैंने रब से ,
मांगा है अब मिल जायेगा ।।

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

भूली भूली सी सब राहें,
पल पल पग ये लहराए रे,
दूर कहीं पर खड़ा सिपाही,
बस यही टेर लगा जाए रे ।
घोर अमावस की ये राते,
कुछ पल में ही कट जाएगा,
नेक नियत से मैंने रब से ,
मांगा है अब मिल जायेगा ।।

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

बुझी बुझी आशाएं दिल की ,
चंचलता चितवन ने है खोई ,
अपने है अपनो से ही रूठे ,
मानो वह अनजान हैं कोई ।
सूखे दिल की पोखर में फिर,
बहुरंग कमल खिल जाएगा,
नेक नियत से मैंने रब से ,
मांगा है अब मिल जायेगा ।।

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

फंसी हुई है जमुन भंवर में ,
जीवन हे कन्हैया कहाँ हो,
कोई भी साहिल दिखे न डगमग,
डोले हे जीवन नैया कहां  हो।
लहरों से अठखेलियां करती ,
जीवन फिर से लौट आएगा,
नेक नियत से मैंने रब से ,
मांगा है अब मिल जायेगा ।।

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

छोड़ उमंगों की आँचल को ,
चाहत की तितली उड़ उड़ जाए,
गुमसुम बैठी सुमन कली अब,
ना कोई भौरा भी गुनगुनाये।
बस कुछ दिन की बात है फिर से,
बहार चमन में छा जाएगा,
नेक नियत से मैंने रब से ,
मांगा है अब मिल जायेगा।।

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

दिया ही दिया है हमने गर तो,
अपना नही कुछ खोने वाला,
घोर तिमिरमय राहों में भी,
विचलित पग नही होने वाला।
हे धरती के दिव्य अलंकरण,
पा सांसे तुझे सुख पायेगा,
नेक नियत से मैंने रब से ,
मांगा है अब मिल जायेगा।।

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

अब हो प्रण नवजीवन में यह ,
नव धर्म के पथ पर पग धरने ,
भूले हुए निज कर्तव्यों को राही,
जीवन मे सुकृति सजग करने ।
आती जाती सुख दुख घड़ियां,
अब कोई गिला नही दे पाएगा,
नेक नियत से मैंने रब से ,
मांगा है अब मिल जायेगा।।

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::
सकारात्मक सोचो
स्वस्थ रहो


रचना - कुर्मि रामावतार चन्द्राकर














रविवार, 21 मार्च 2021

क्या कहूँ ?

:::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

पाने को मंजिल की खुशबू ,
कितने फूलों को मसल दिया,
कुमुदनी इंदु को अर्पित की ,
सूरज को नव कमल दिया।
आह्लाद हुआ मन जिसको पाकर,
 जाने किसने रहमत की,
कर्मों का परिणाम कहूँ या,
 इसको रेखा किस्मत की ।।

:::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

मीलों  चलकर जलकर आग में ,
जिसको हासिल कर न सका,
अरमान मेरे मन मुकुर में थे जो,
उसको मुट्ठी में धर न सका ।
न जाने किसने अनायास फिर,
मेरे नाम वसियत की,
कर्मों का परिणाम कहूँ या,
 इसको रेखा किस्मत की ।।

:::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

विटप ओट में छुपकर उसने,
 वन का सारा राज टटोला,
मालिगन को रिश्वत देकर,
  बगिया का वो कपाट है खोला।
दावानल लगे लग जाये,
 बात नही ये हैरत की ,
कर्मों का परिणाम कहूँ या,
 इसको रेखा किस्मत की ।।

:::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

किये बहुत कोशिश कि मैंने,
मेरा वह मनमीत मिल  जाए,
करके नयन दीदार जिनका,
चमक उठे ये दिल खिल जाए।
हुई साधना मेरी निष्फल ,
मैंने जितनी भी मन्नत की,
कर्मों का परिणाम कहूँ या,
 इसको रेखा किस्मत की ।।

:::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

फंसकर रिश्तों के भ्रमजाल में,
हर कर्तव्य  निभाया  फिर भी ,
रज़ा थी जिसमे समय प्रहरी की,
सब इल्जाम सहा मैं फिर भी ,
होकर हताश उस द्वार से मैंने।
दीप जलाकर रुखसत की,
कर्मों का परिणाम कहूँ या,
 इसको रेखा किस्मत की ।।

:::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

रोज बरसती जल की बूंदे,
फिर भी प्यासा रह जाता वो,
आते जाते मेघों के कर ,
कुछ सन्देश है भिजवाता वो।
है चातक की अटल तपस्या ,
या फिर किसी ने दहशत की,
कर्मों का परिणाम कहूँ या,
 इसको रेखा किस्मत की ।

:::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

रोज बसाता हूं यह सोच के,
अपनें  अरमानो की बस्ती,
कभी तो स्थिर हो जाएगी,
एक न एक दिन मेरी हस्ती।
तूफानों का रेला आकर ,
बार बार यही हरकत की,
कर्मों का परिणाम कहूँ या,
 इसको रेखा किस्मत की ।।

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

चीर समय के तेज धार को,
मैनें उसको चलते देखा ,
अपने मंजिल की वेदी पर ,
सब कुछ अर्पण करते देखा।
फिर भी उसको न्याय दिलाने,
नही समय ने हिम्मत की,
कर्मों का परिणाम कहूँ या,
 इसको रेखा किस्मत की ।।

:::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::













ऐ दोस्त ...

=============================== थाम लेती है किनारे अपनी बाहों में , रूठकर आती हुई  लहरों के वेग को । समा लेती है अपने अंदर समंदर जैसे , दौड़क...