रविवार, 11 जुलाई 2021

ओझल




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मेरे जीवन से वो क्या ओझल हुए ,
महफिले लूट गयी कारवाँ न रहा  ।
ऐसी बरसी निगाहों से चिंगारियां ,
जल गए सारे खत दास्तां ना रहा ।
सजाना था मुझको ऐ जश्ने बहार,
मन मेरा पर न जाने क्यूं गुमसुम हुआ ।
जिसकी आगोश में पल रहे ख्वाब थे ,
प्रेमोदधि वो जाने  कहाँ गुम हुआ ।।

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देखे सतरँगी अरमान सँजोये थे संग ,
मिलके जिसके नयन से नयन ये मेरा ।
कभी जगमग थी अपनी वफ़ा के दीये ,
शाम नमकीन थी तो मीठा सा सवेरा ।
उसके होने से खुशियां कभी कम न थी ,
उसके खोने से जन्नत जहन्नुम हुआ ।
जिसकी आगोश में पल रहे ख्वाब थे ,
प्रेमोदधि वो जाने  कहाँ गुम हुआ ।।

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प्रेम कश्ती भंवर बीच डूब ना गयी ,
आसरा मुझे तिनके का तब तक रहा ।
लोग पूछते हैं तूफां अधिक थी या कम ,
कारवाँ लूट जाने का कब तक रहा ।
मैं बताऊंगा अपनी व्यथा सब्र कर ,
दास्तां सुन के चन्दा भी कुमकुम हुआ ।
जिसकी आगोश में पल रहे ख्वाब थे ,
प्रेमोदधि वो जाने  कहाँ गुम हुआ ।।

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कभी "अवतार" जिसकी अनुज्ञा से मैं ,
उस प्रणय के निकेतन के दहलीज पर ।
रख दिये थे कदम आचमन के लिए ,
था भरोसा मुझे उसकी ताबीज पर ।
संग उसके मेरे संग था भाग्य भी ,
फिर अचानक से जीवन ये महरूम हुआ ।
जिसकी आगोश में पल रहे ख्वाब थे ,
प्रेमोदधि वो जाने  कहाँ गुम हुआ ।।

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दीप्ति को जिसकी पाकर थी रोशन दीये ,
सदा मिलता रहा कभी ना कुछ गया ।
अब हवा भी सुगन्धित ना मध्यम रहा ,
मेरे जीवन की जलसा से लौ बुझ गया ।
कभी खुशियों  से दिल ये सराबोर था ,
अब ये शीशे सा टूटकर के  मासूम हुआ ।
जिसकी आगोश में पल रहे ख्वाब थे ,
प्रेमोदधि वो जाने  कहाँ गुम हुआ ।।

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 जिसकी उपमा में  हमने कसीदे पढ़े ,
बाग, फूलों, बहारों को समझा ना कुछ ।
उड़ते जुल्फों को मेघों से कम ना कहा ,
हंसी सूरत के आगे थी चन्दा भी तुच्छ ।
उनकी आंखों को मीठा समंदर कहा ,
और ये  बूंदे भी पायल का रुमझुम हुआ ।
जिसकी आगोश में पल रहे ख्वाब थे ,
प्रेमोदधि वो जाने  कहाँ गुम हुआ ।।

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वो मोहब्बत की मल्लिका कहां खो गयी ,
मैं अकिंचन बना यूँ फिरूँ दर-ब-दर ।
देखो सावन भी आकर बरसने लगे ,
आ भी जाओ न तड़पाओ ओ बेखबर ।
धरा भी प्रफुल्लित हो अब सज रही ,
मिलन हेतु अम्बर में भी हुम हुआ ।
जिसकी आगोश में पल रहे ख्वाब थे ,
प्रेमोदधि वो जाने  कहाँ गुम हुआ ।।

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था ये वादा की "ओझल "न होंगे कभी ,
चाहे नदियां की धारा भी विपरीत बहे ।
अपनी चाहत से गुलशन उठेगा महक ,
सिर्फ आहट से अब नवसृजन हो रहे ।
जिसमे पल्लव न फूल और कभी फल लगे ,
ऐसे पतझड़ में  अब वो कल्पद्रुम हुआ ।
जिसकी आगोश में पल रहे ख्वाब थे ,
प्रेमोदधि वो जाने  कहाँ गुम हुआ ।।

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