शुक्रवार, 25 जून 2021

चलता ही जाऊंगा

                          
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 सौगन्ध  मुझे करनी होगी की भूल, भूल से भी न हो ,
अब शेष बचे इस जीवन मे अपमान किसी का भी न हो ।हो दुर्गम अगम खार मय पथ ना पीछे कदम हटाऊंगा ,
मंजिल की ओर अपनी चलता ही जाऊंगा ।।

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मेरु के शिखर से लेकर उन थार के रेगिस्तानों से
अवनी अम्बर के आंचल से उन दण्डक वन वीरानों से ।
सागर के अन्तरहृद से मैं दसचारी रतन ढूंढ लाऊंगा ,
मंजिल की ओर अपनी चलता ही जाऊंगा ।।

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भुजदण्ड उठाकर राघव ने कानन में जो बात कहा ,
नींद नारी भोजन को त्याग सौमित्र ने जो सन्ताप सहा ।
अंगद के पाव सा मैं भी अब शुभ संकल्पों को जमाउंगा ,
मंजिल की ओर अपनी चलता ही जाऊंगा ।।

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नवपुंज दिवाकर रश्मि से निज दुर्गुण को नहलाकर के ,
मनोविकार की निकरों को ध्रुवनन्दा से मैं धोकर के ।
अभिअंतर में सद्भावों का दुर्भिक्ष नही पड़ने दूंगा ,
मंजिल की ओर अपनी चलता ही जाऊंगा ।।

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मैं नीलमणि अवलम्बन पर ध्रुव सा अटल विश्वास रखूं ,
विकारों के षणयंत्रो पर  प्रह्लाद सा संयम , आस रखूँ ।
अब कालचक्र आघातों पर मैं मलय का लेप लगाऊंगा ,
मंजिल की ओर अपनी चलता ही जाऊंगा ।।

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चल रहे तिमिरमय राहों में उन पथिको का मैं दीप बनूं ,
खजूर  नही बरगद सा बनूँ स्वातिबून्दों मय सीप बनूँ ।
इन महाभूतों  की शक्ति से पामर को आंख दिखाऊंगा ,
मंजिल की ओर अपनी चलता ही जाऊंगा ।।

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जीवन की इस समरांगण में  निर्वेद अस्र संधान करूँ ,
अरि शस्त्र प्रहार करे जब भी सदचिदानंद का ध्यान धरूँ 
"अवतार "न मीत न बैर कोई , सिद्धांत यही अपनाऊंगा ,
मंजिल की ओर अपनी चलता ही जाऊंगा ।।

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भूल गया था जो इन उच्च आदर्शो के प्रतिमानों को ,
करके अटल "प्रतिज्ञा " मैं अब राह नया अपनाऊंगा ।
दया धर्म करुणा मैत्री गुण भाव सदा धारण करके ,
मंजिल की ओर अपनी चलता ही जाऊंगा ।।

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