बुधवार, 26 मई 2021

समय

रचना -कुर्मी रामावतार चन्द्राकर
:::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

समय बहुत अनमोल रे मनवा,
हर घड़ी का सम्मान करें हम ,
समय की धार में बह बह जाए,
नही इनका तिरस्कार करे हम।
कितने भी विपरीत हो घड़ियां,
नही तनिक दुखों का भान रहे,
हर एक समय का आदर करना ,
हर एक घड़ी का ध्यान रहे ।।

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

समय अश्व पर हो सवार जब,
मंजिल हमको तब ही मिलेगा,
प्रतिकूलता के घोर तिमिर में,
नित ही आस का दीप जलेगा।
मानवता के पृष्ठभूमि पर ,
नही कर्तव्यों का गुमान रहे,
हर एक समय का आदर करना ,
हर एक घड़ी का ध्यान रहे ।।

:::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

समय के मूल्यों पर निर्धारित,
जीवन को तुम्ह करके देखो,
समय की बलि वेदी पर हर पल,
खुद को अर्पण करके देखो ।
समय के ड्योढ़ी पर जीवन के,
सुख - दुख तब मेहमान रहे,
हर एक समय का आदर करना ,
हर एक घड़ी का ध्यान रहे ।।

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

रोज मुंडेर पे रवि की किरणें,
समय पे दस्तक दे जाता है,
सोये हुए हतभाग्य जनों के,
उर में प्रकाश वह भर जाता है।
पोखर में यह खिले कमल दल,
हम सबसे तब यह "बान "कहे ,
हर एक समय का आदर करना ,
हर एक घड़ी का ध्यान रहे ।।

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

समय समय पर सबने अपना ,
दुनियां में है हुकुम चलाया,
कंस हो रावण हो या सिकन्दर,
समय की मार से बच नही पाया ।
समय के पदचिन्हों पर चलकर,
हमे नैतिकता का अभिमान रहे,
हर एक समय का आदर करना ,
हर एक घड़ी का ध्यान रहे ।।

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

कठिन समय हो या अनुकूलता,
हे पथिक पथ से विचलित न होना,
समय के नियमो का पालन कर,
सफलता का हर शिखर है छूना ।
नित  हो धर्ममय जीवन अपना,
नित अधरों पर मुस्कान रहे,
हर एक समय का आदर करना ,
हर एक घड़ी का ध्यान रहे ।।
::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

(बान = बात ,सन्देश)

शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

मिल जाएगा

मिल जाएगा 
::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

विस्मृत मन में ख्वाब सुनहरे ,
यूं ही उलझ उलझ जाए रे,
टूटी हुई सी तारे मन की,
 फिर से राग सुना जाए रे।
तिल तिल मरती हुई सांसो में,
 जीवन फिर से भर जाएगा,
नेक नियत से मैंने रब से ,
मांगा है अब मिल जायेगा ।।

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

भूली भूली सी सब राहें,
पल पल पग ये लहराए रे,
दूर कहीं पर खड़ा सिपाही,
बस यही टेर लगा जाए रे ।
घोर अमावस की ये राते,
कुछ पल में ही कट जाएगा,
नेक नियत से मैंने रब से ,
मांगा है अब मिल जायेगा ।।

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

बुझी बुझी आशाएं दिल की ,
चंचलता चितवन ने है खोई ,
अपने है अपनो से ही रूठे ,
मानो वह अनजान हैं कोई ।
सूखे दिल की पोखर में फिर,
बहुरंग कमल खिल जाएगा,
नेक नियत से मैंने रब से ,
मांगा है अब मिल जायेगा ।।

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

फंसी हुई है जमुन भंवर में ,
जीवन हे कन्हैया कहाँ हो,
कोई भी साहिल दिखे न डगमग,
डोले हे जीवन नैया कहां  हो।
लहरों से अठखेलियां करती ,
जीवन फिर से लौट आएगा,
नेक नियत से मैंने रब से ,
मांगा है अब मिल जायेगा ।।

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

छोड़ उमंगों की आँचल को ,
चाहत की तितली उड़ उड़ जाए,
गुमसुम बैठी सुमन कली अब,
ना कोई भौरा भी गुनगुनाये।
बस कुछ दिन की बात है फिर से,
बहार चमन में छा जाएगा,
नेक नियत से मैंने रब से ,
मांगा है अब मिल जायेगा।।

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

दिया ही दिया है हमने गर तो,
अपना नही कुछ खोने वाला,
घोर तिमिरमय राहों में भी,
विचलित पग नही होने वाला।
हे धरती के दिव्य अलंकरण,
पा सांसे तुझे सुख पायेगा,
नेक नियत से मैंने रब से ,
मांगा है अब मिल जायेगा।।

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

अब हो प्रण नवजीवन में यह ,
नव धर्म के पथ पर पग धरने ,
भूले हुए निज कर्तव्यों को राही,
जीवन मे सुकृति सजग करने ।
आती जाती सुख दुख घड़ियां,
अब कोई गिला नही दे पाएगा,
नेक नियत से मैंने रब से ,
मांगा है अब मिल जायेगा।।

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::
सकारात्मक सोचो
स्वस्थ रहो


रचना - कुर्मि रामावतार चन्द्राकर














नई आस

                 नई आस                कल्पना साकार होता दिख रहा है, आसमाँ फिर साफ होता दिख रहा है।। छाई थी कुछ काल से जो कालिमा, आज फिर से ध...